"हमने समझा था कि होगा कोई हमदर्द-ए-वतन,
क्या खबर थी कि सियासत का सफर तख़्त तक है।"
भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। 1947 में आजादी के बाद जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव रखी गई, उसका आधार था- जनता का जनादेश, राजनीतिक दलों की वैचारिक प्रतिबद्धता, संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और जनता के प्रति जवाबदेही। लेकिन आज जब देश की राजनीति को देखते हैं तो एक बड़ा सवाल बार-बार उठता है- क्या भारत का राजनीतिक सिस्टम अपने मूल उद्देश्यों से भटक चुका है? क्या लोकतंत्र का ढांचा बचा है, लेकिन उसकी आत्मा कमजोर पड़ गई है?
दल-बदल: जनादेश का अपमान या राजनीतिक अधिकार?
लोकतंत्र में मतदाता केवल किसी व्यक्ति को वोट नहीं देता, बल्कि वह एक विचार, एक दल और एक राजनीतिक दिशा को भी चुनता है। ऐसे में जब कोई सांसद या विधायक चुनाव जीतने के बाद पार्टी बदल लेता है, तो सवाल उठता है कि उसने जिस जनादेश के आधार पर जीत हासिल की थी, उसका क्या हुआ?
हाल के वर्षों में ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। पश्चिम बंगाल में कई नेताओं ने चुनावी परिस्थितियों के अनुसार पाला बदला। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना टूट गई और बाद में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में भी बड़ी टूट देखने को मिली। बिहार, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, गोवा, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और अन्य राज्यों में भी दल-बदल और राजनीतिक पुनर्संरचना की घटनाएं सामने आईं।
अब समाजवादी पार्टी को लेकर भी समय-समय पर अटकलें लगती रहती हैं कि उसके कुछ नेता दूसरे राजनीतिक विकल्प तलाश सकते हैं। चाहे ये अटकलें सच साबित हों या नहीं, लेकिन यह माहौल ही बताता है कि राजनीतिक स्थिरता और वैचारिक प्रतिबद्धता पर जनता का भरोसा कमजोर हुआ है।
कार्यकर्ताओं के साथ क्या हो रहा है?
किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत उसका कार्यकर्ता होता है। वह वर्षों तक पार्टी का झंडा उठाता है, संघर्ष करता है, विरोध झेलता है और संगठन को मजबूत करता है। लेकिन आज कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि चुनाव आते ही दूसरे दलों से आए प्रभावशाली नेताओं को टिकट, पद और महत्व मिल जाता है।
इससे कार्यकर्ताओं में यह भावना पैदा होती है कि उनकी वर्षों की मेहनत का मूल्य क्या है? यदि अंततः राजनीतिक सफलता केवल प्रभावशाली चेहरों को शामिल करने की रणनीति पर निर्भर है, तो संगठनात्मक निष्ठा का महत्व कहाँ रह जाता है?
यही वह बिंदु है जहाँ राजनीति एक वैचारिक आंदोलन से अधिक चुनावी प्रबंधन का माध्यम दिखाई देने लगती है।
विचारधारा का क्षरण
भारतीय राजनीति में कभी विचारधारा केंद्रीय भूमिका निभाती थी। कांग्रेस का राष्ट्रवाद, समाजवादियों का सामाजिक न्याय, वामपंथ का वर्ग संघर्ष, जनसंघ और बाद में भाजपा का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद- ये केवल चुनावी नारे नहीं बल्कि राजनीतिक पहचान थे।
आज भी विचारधाराएं मौजूद हैं, लेकिन जनता का एक बड़ा वर्ग महसूस करता है कि राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक सीमाएं पहले की तुलना में धुंधली हुई हैं। नेता जिस पार्टी को कल तक लोकतंत्र के लिए खतरा बताते थे, कुछ समय बाद उसी पार्टी के मंच पर दिखाई दे सकते हैं।
जब राजनीतिक विरोध और राजनीतिक सहयोग के बीच की रेखा इतनी तेजी से बदलती है, तब मतदाता के मन में स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि आखिर वास्तविक प्रतिबद्धता किसके प्रति है-विचारधारा, जनता या सत्ता?
संवैधानिक संस्थाओं पर बढ़ते सवाल
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। चुनाव आयोग, न्यायपालिका, संसद, मीडिया और अन्य संस्थाएं उसकी रीढ़ होती हैं।
पिछले कुछ वर्षों में चुनाव आयोग, सर्वोच्च न्यायालय, जांच एजेंसियों और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक समूहों ने सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, इन संस्थाओं के समर्थक कहते हैं कि आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है और संस्थाएं अभी भी अपने संवैधानिक दायित्व निभा रही हैं।
लेकिन लोकतंत्र में केवल निष्पक्षता ही नहीं, निष्पक्षता का सार्वजनिक विश्वास भी महत्वपूर्ण होता है। यदि नागरिकों का एक बड़ा वर्ग संस्थाओं पर भरोसा खोने लगे, तो लोकतंत्र की वैधता प्रभावित होने लगती है।
क्या वास्तव में सिस्टम क्रैश हो चुका है?
इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है।
यदि "सिस्टम क्रैश" का अर्थ यह है कि चुनाव बंद हो गए हैं, सत्ता परिवर्तन असंभव हो गया है या संविधान निष्प्रभावी हो गया है, तो उत्तर होगा- नहीं।
लेकिन यदि "सिस्टम क्रैश" का अर्थ यह है कि जनता और राजनीति के बीच विश्वास का रिश्ता कमजोर हो रहा है, विचारधारा की जगह अवसरवाद बढ़ रहा है, कार्यकर्ता हाशिए पर जा रहे हैं, दल-बदल सामान्य राजनीतिक व्यवहार बनता जा रहा है और जनता को लगता है कि उसका जनादेश स्थायी नहीं बल्कि सौदेबाजी का साधन बन गया है- तो इस चिंता को खारिज भी नहीं किया जा सकता।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती
लोकतंत्र की शक्ति केवल वोटिंग मशीनों, चुनावी कार्यक्रमों और संवैधानिक किताबों में नहीं होती। उसकी वास्तविक शक्ति जनता के विश्वास में होती है।
जब जनता यह महसूस करने लगे कि उसका वोट केवल सरकार बनाने के लिए जरूरी है, लेकिन बाद में उसके जनादेश का अर्थ बदल सकता है; जब कार्यकर्ता यह महसूस करने लगे कि निष्ठा से अधिक राजनीतिक उपयोगिता महत्वपूर्ण है; जब वैचारिक प्रतिबद्धता की जगह राजनीतिक सुविधा लेने लगे- तब लोकतंत्र के सामने गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
1947 में खड़ा हुआ भारतीय लोकतंत्र अनेक संकटों से गुजरा है और हर बार स्वयं को मजबूत करके उभरा है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि लोकतंत्र समाप्त हो गया है। लेकिन यह कहना भी मुश्किल है कि सब कुछ सामान्य है।
आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कौन सी पार्टी जीतेगी या हारेगी। असली प्रश्न यह है कि क्या राजनीति जनता के प्रति अपनी जवाबदेही बनाए रख पा रही है?
क्योंकि यदि लोकतंत्र का केंद्र जनता की बजाय केवल सत्ता, शक्ति और राजनीतिक प्रबंधन बन जाए, तो खतरा केवल किसी एक दल या सरकार के लिए नहीं होता- खतरा उस लोकतांत्रिक विश्वास के लिए होता है जिसने 1947 में इस राष्ट्र को एक गणराज्य बनने का साहस दिया था।
और शायद आज भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है-
क्या हमारा लोकतंत्र अभी भी जनता के लिए काम कर रहा है, या फिर जनता केवल उस राजनीतिक खेल की दर्शक बनकर रह गई है, जिसका अंतिम लक्ष्य अब सेवा नहीं, बल्कि सत्ता और शक्ति का संरक् बन चुका है?