भारतीय रुपया मंगलवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 91 के ऑल-टाइम लो पर पहुंच गया। आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक, रुपया आज 91.03 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ। विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और वैश्विक व्यापारिक तनाव के चलते रुपए पर जबरदस्त दबाव बना हुआ है।
साल 2026 की शुरुआत से ही रुपया कमजोरी दिखा रहा है। दिसंबर 2025 में पहली बार रुपया 90 के पार गया था और अब महज 20 दिनों के भीतर 91 का स्तर भी टूट गया। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नई टैरिफ नीतियों और बढ़ते वैश्विक तनाव के कारण निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे डॉलर और सोना मजबूत हो रहा है।

1. विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं। जनवरी 2026 के पहले 20 दिनों में ही FPI ने करीब ₹29,315 करोड़ की बिकवाली की है। जब निवेशक भारत से पैसा निकालते हैं, तो उन्हें डॉलर की जरूरत होती है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।
2. ट्रम्प की टैरिफ नीतियां और वैश्विक तनाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से यूरोपीय देशों पर नए टैरिफ लगाने की धमकी और ‘ग्रीनलैंड विवाद’ जैसी घटनाओं ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा दी है। ऐसे माहौल में निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकालकर डॉलर और सोने में निवेश बढ़ा रहे हैं।
3. मजबूत अमेरिकी अर्थव्यवस्था और ऊंची ब्याज दरें
अमेरिका में बेरोजगारी दर कम है और अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है। इससे यह संकेत मिल रहा है कि वहां ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं। बेहतर रिटर्न के लालच में निवेशक अमेरिकी बॉन्ड और बैंकों की ओर जा रहे हैं, जिससे डॉलर और मजबूत हो रहा है।

आज यानी 20 जनवरी को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ट्रम्प की टैरिफ नीतियों की वैधता पर बड़ा फैसला सुनाने वाला है। अगर कोर्ट ट्रम्प के पक्ष में फैसला देता है, तो वैश्विक व्यापारिक तनाव और बढ़ सकता है। वहीं, अगर फैसला खिलाफ जाता है तो बाजार को कुछ राहत मिल सकती है।
सीआर फॉरेक्स एडवाइजर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर अमित पाबारी के मुताबिक, अगर रुपया 91.07 के ऊपर टिकता है, तो यह जल्द ही 91.70 से 92.00 के स्तर तक जा सकता है। हालांकि, आरबीआई बीच-बीच में बाजार में दखल देकर गिरावट को थामने की कोशिश कर रहा है। फिलहाल 90.30 से 90.50 का स्तर रुपए के लिए मजबूत सपोर्ट माना जा रहा है।

रुपए के कमजोर होने से इम्पोर्ट महंगा हो जाता है। इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य आयातित वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है।
इसके अलावा विदेश में पढ़ाई और घूमना भी अब पहले से ज्यादा महंगा हो गया है।
उदाहरण के तौर पर, जब डॉलर के मुकाबले रुपया 50 था, तब 1 डॉलर के लिए 50 रुपये देने पड़ते थे। अब 1 डॉलर के लिए 91 रुपये खर्च करने होंगे, जिससे विदेश में पढ़ने वाले छात्रों की फीस, रहन-सहन और रोजमर्रा का खर्च काफी बढ़ जाएगा।
जब डॉलर के मुकाबले किसी देश की मुद्रा कमजोर होती है, तो उसे करेंसी डिप्रिसिएशन कहा जाता है।
किसी भी देश की करेंसी की कीमत उसके फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व, डॉलर की मांग-आपूर्ति और वैश्विक आर्थिक हालात पर निर्भर करती है।
अगर भारत के पास पर्याप्त डॉलर रिजर्व होता है, तो रुपया स्थिर रहता है। लेकिन जब डॉलर की मांग बढ़ती है या रिजर्व घटता है, तो रुपया कमजोर हो जाता है।
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